रोज़ उठता हूँ इस बहाने से,
रौनक हो मेरा दिन, तेरे आने से।
हर बुझती शमा का इक फसाना था,
तेरा आँसुओ का दरिया बनाने से।
कायदा यहीं था, कि बे-आबरू निकलें,
कभी मस्ज़िद से, कभी मयख़ाने से।
ज़ाहिर है ये, तुमसे मुहब्बत है,
क्या फ़र्क़ आना है, आज़माने से।
रोज़ उठता हूँ इस बहाने से,
रौनक हो मेरा दिन, तेरे आने से।
हर बुझती शमा का इक फसाना था,
तेरा आँसुओ का दरिया बनाने से।
कायदा यहीं था, कि बे-आबरू निकलें,
कभी मस्ज़िद से, कभी मयख़ाने से।
ज़ाहिर है ये, तुमसे मुहब्बत है,
क्या फ़र्क़ आना है, आज़माने से।