एक अधूरे बचपन की, सिमटी हुई दीवारों से,
झाँक रही अब तक मानो, गुडिया कोई पुरानी सी।
रंगों में डूबी आखों से, सपनों की लडियां बुनती सी,
धुंधले धुंधले से रिश्तों में, अपना कोई बनाती सी।
चिथडों के छिन जाने से, और फिर से ठोकर खाने से,
चेहरों से रूठ जाने की, आदत कोई रानी सी।
अपने बचपन को पाने को, नानी की किसी कहानी में,
झाँक रही फिर से देखो, गुडिया वही पुरानी सी।