दुनिया में रहने का हुनर सीख लीजिए,
अपने दुःख दर्द, आप ही पी लीजिए।
हसीं ठहाकों पर चलने दें यह दुनिया,
सच से बस थोड़ा, मुँह फेर लीजिए।
सुना है बाज़ार में, कुछ खिलौने आए हैं नए,
चलिए कुछ मर्तबा, उनसे ही खेल लीजिए।
मन भर जाए तो फेंक कर उन्हें,
फटी पुरानी चादर में, खुद को समेट लीजिए।
आसमान में फैले रंगों को देखकर,
अपने ही आप का मज़ा लीजिए।
क्यों ही हर रोज़ धूप खुलेगी?
कभी बादलों में छिपी एक बूंद ढूंढ लीजिए।
कोई मिला, तो चलें, कुछ दूर ही सही,
मिल कर पैरों के निशान बांध लीजिए।
थक जाएँ कभी अपनी मंजिल तलाश कर,
उसी सड़क की फिर ख़ाक छान लीजिए।