Musafir

हुई मुद्दत, सोचता हूँ, जुबां काफिर क्यूँ है?
नाम तेरा, होठों पर मेरे, आखिर क्यूँ है?

हर पत्थर, हर ज़र्रे में, मैं ही मैं रहा,
इन रास्तों पर तू नया, मुसाफिर क्यूँ है?

इक अदद शाम की, मुझको तलाश है,
सूरज, ज़िन्दगी का मंज़र, आखिर क्यूँ है?

क्या खो गया खुदा तेरा, कि बुत बना रहा?
ना आ सकूं जहां, वहाँ हाज़िर क्यूँ है?